ye gham phir se ubharta ja raha hai | ये ग़म फिर से उभरता जा रहा है

  - Amit Sharma Meet

ये ग़म फिर से उभरता जा रहा है
मुझे हैरान करता जा रहा है

सुना मेयार गिरता जा रहा है
मगर बंदा निखरता जा रहा है

मुझे ये क्या हुआ है कुछ दिनों से
तिरा एहसास मरता जा रहा है

अमाँ इस ख़्वाब को भी क्या कहें अब
बिखरना था बिखरता जा रहा है

तिरा ख़ामोशियों को वक़्त देना
सदाओं को अखरता जा रहा है

हमीं ने ही उसे रस्ता दिया था
हमीं पे पाँव धरता जा रहा है

पुरानी देख कर तस्वीर तेरी
नया हर दिन गुज़रता जा रहा है

मैं जितनी और पीता जा रहा हूँ
नशा उतना उतरता जा रहा है

सुना है 'मीत' ख़्वाबों से निकल कर
वो आँखों में ठहरता जा रहा है

  - Amit Sharma Meet

Waqt Shayari

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