ज़ेहन में अब जैसे बच्चे आ गए हैं

हम यहाँ तक हँसते हँसते आ गए हैं

तब से इतनी बार देखी तेरी फोटो
आँखों के अब नीचे गड्ढे आ गए हैं

इक भी रस्ता सच नहीं है ज़िंदगी का
देखो कितने लोग चल के आ गए हैं

इक तो पहले ही वो इतनी ख़ूब-सूरत
और फिर आँखों पे चश्में आ गए हैं

ज़िंदगी ने मारी तब तब हम को ठोकर
जब लगा गिरते सँभलते आ गए हैं

— Amit Kumar

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