इक शिकायत रोज़ रहती है मुझे
और दिल में रोज़ ख़लती है मुझे
बाप आँसू क्यूँ दिखाता है नहीं
बात 'ना' ही ये समझती है मुझे
रह सकोगी क्या सनम मेरे सिवा
हर घड़ी जो कॉल करती है मुझे
मुस्कुरा कर दिल चुराती वो मेरा
फिर गले से रोज़ लगती है मुझे
काश! मेरी ज़िन्दगी खुशहाल हो
सुन के अक्सर मौत हँसती है मुझे
वो रक़ीबों से हमेशा मिलती है
और आ कर जान कहती है मुझे
शौक़ से करता हूँ सागर शा'इरी
बस अता में रोज़ मिलती है मुझे
— Aniket sagar















