'इश्क़ मुझ सेे है नहीं गर मत करो तुम बात भी
हक़ मुझे जब ना मिला, नईं चाहिए ख़ैरात भी
उसको सोचूं तो ख़ुदा की याद आती है मुझे
वो जो मुझ सेे दूर भी है और मेरे साथ भी
एक मंज़र जो नहीं होता है ओझल आँखों से
और फिर थमती नहीं इन आँखों से बरसात भी
जो उदासी में है लगता आ के सीने से मेरे
ख़ुश हो जाए तो छुड़ाने लगता है वो हाथ भी
चाहता हूँ मैं कभी ना खत्म हों ये बारिशें
बस में लेकिन हैं नहीं ये वस्ल के लम्हात भी
एक तो काटे नहीं कटते हैं हम सेे ऐसे दिन
फिर सितमगर बन के आ जाती है काली रात भी
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