रात की वहशत को जानो डर गए
बोल लो ख़ुद से कभी लो डर गए
इश्क़ के जलते चराग़ों क्या हुआ
तुम अभी से बुझ रहे हो डर गए
जिस्म के हर मोड़ को तो छू लिया
रूह पर भी हाथ रक्खो डर गए
झूलना पंखे से चाहा जब कभी
देख कर कमज़ोर छत को डर गए
मानता हूँ मैं ग़लत था ठीक है
आँख से आँखें मिलाओ डर गए
रोज़ हालातों से हम लड़ते रहे
जीते जी वो मर गए जो डर गए
— Anmol Mishra















