आजकल का आब-ओ-दाना और है
जो हुआ उस का बताना और है
दिल-लगी करना सताना और है
इश्क़ लेना घर बसाना और है
क़हक़हों का शोर है चारों तरफ़
चल रहा दिल में तराना और है
ये वफ़ा या बे-वफ़ाई सा नहीं
आप का नज़रें चुराना और है
कश्तियों में पाँव धोना और है
बीच में फिर डूब जाना और है
— anupam shah















