har ek shaKHs mira shahar men shanaasa tha | हर एक शख़्स मिरा शहर में शनासा था

  - Anwar Taban

हर एक शख़्स मिरा शहर में शनासा था
मगर जो ग़ौर से देखा तो मैं अकेला था

वो ख़्वाब ऐश-ए-तरब का जो हम ने देखा था
हक़ीक़तों से परे था हसीन धोका था

ख़ुदा हमें भी दिखा दे वो दौर कैसा था
ख़ुलूस-ओ-मेहर का हर शख़्स जिस में दरिया था

सितम भी मुझ पे वो करता रहा करम की तरह
वो मेहरबाँ तो न था मेहरबान जैसा था

गुज़िश्ता रात भी हम ने यूँँही गुज़ारी थी
ज़मीन को फ़र्श किया आसमान ओढ़ा था

उसी को मतलबी 'ताबाँ' कहा ज़माने ने
दुआ सलाम जो छोटे बड़े से रखता था

  - Anwar Taban

Raat Shayari

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