इक ज़रा सी बात को बढ़ा चढ़ा बता दिया
दुख नहीं था उतना जितना हमने ये दिखा दिया
खल रही थी धुन उसे सो सांस अपनी रोक ली
नद ने सूख कर मुसाफ़िरों को रास्ता दिया
मुझ को सर्दियों से था बचाने में लगा हुआ
मैंने फूंक मार कर अलाव जो बुझा दिया
मेरे मरने पे ठहरने की जगह निकल गई
गीली उस ज़मीं को मेरी राख ने सुखा दिया
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