जो भी सुकून है दिल का वो ही क़यामत है
गुलों के बीच हैं काँटे यही मोहब्बत है
कभी नज़र को उठा कर इधर नज़र कर लो
मिरे कलाम का हासिल वही इबादत है
तिरे ख़याल से बेहतर कहीं दवा ही नहीं
मिरे इलाज का हर हर्फ़ भी हिकायत है
तिरा ये हुस्न कभी भी बदल न पाएगा
नज़र में अब भी वही चाँद की शरारत है
ग़म-ए-हयात भी हैराँ हुआ ये जाना जब
मिरा वजूद है जो भी तिरी अमानत है
ये ज़िन्दगी तो अकेली कटी अज़ाबों में
कि सिर्फ़ प्यार तिरा ही मिरी विरासत है
मिरे ख़याल में रक़्साँ तिरी अदाएँ हैं
मिरी रगों में तिरी चाह की हरारत है
— arjun chamoli















