"धब्बा"

जब जिस्म-ओ-जाँ ये मिल रहे थे साथ में खिलते रहे
आग़ाज़ था वो आश्ना का रोज़ हम मिलते रहे
वो रोज़-ए-बह का दौर था बे-फ़िक्र दोनों थे कभी
जब साथ होना ज़िंदगी थी साथ हम चलते रहे
किस की नज़र हम को लगी जो इश्क़ में धब्बा लगा
रुस्वा हुए दोनों ही जब तो साथ से बचते रहे
मासूमियत को जब समझदारी हवा देने लगी
दुश्वार तब मिलना हुआ तो अजनबी बनते रहे
ठंडा लहू पड़ने लगा निकला जनाज़ा इश्क़ का
वो दौर था ज़ालिम बड़ा उस दौर में मरते रहे
जब हौसले ने हार मानी और तन्हाई बढ़ी
सहरा बना गुलशन हमारा ज़ख़्म भी बढ़ते रहे
जब सोचते है आज होता है गिला हम को यहीं
मतलब ज़माने को न था हम बेवजह डरते रहे
दुनिया की आदत है कि हर आशिक़ को रुस्वाई मिले
ख़ूँ इश्क़ का हम ने किया दुनिया को हम कहते रहे
ये पाप अपने सर पे है धोना भी हम ने है इसे
कुछ सोचना बाक़ी नहीं इस बार बस मिलते रहे

— arjun chamoli

More by arjun chamoli

Other nazm from the same pen

See all from arjun chamoli →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling