तेरा जलवा जो आम हो जाए
आदमी बे-लगाम हो जाए
इतनी जचती नहीं है ख़ामोशी
कुछ न कुछ तो कलाम हो जाए
तेग़ हो जाए रूह मेरी भी
हम सफ़र जो नियाम हो जाए
तू अगर पूछ ले हमारा हाल
दर्द दिल का तमाम हो जाए
सारी दुनिया ग़ुलाम हो उसकी
वो जो तेरा ग़ुलाम हो जाए
हासिल-ए-इश्क़ ही जफ़ा है तो
'इश्क़ मुझ पर हराम हो जाए
होगी ज़ाए' सभी नमाज़-ए-इश्क़
हुस्न ही जब इमाम हो जाए
'इश्क़ में बे-वफ़ाई हो न मुआफ़
आह ये ख़ास-ओ-आम हो जाए
आख़िरी रास्ता है तर्क-ए-इश्क़
आख़िरी इक सलाम हो जाए
चैन मिल जाए कुछ घड़ी साहिल
सुब्ह-ए-ग़म की जो शाम हो जाए
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