इश्क़ में गुज़रे ज़माने पे हँसी आती है
रात दिन अश्क बहाने पे हँसी आती है
जिन को रो रो के सुनाते थे कभी अपनों को
अब वही क़िस्से सुनाने पे हँसी आती है
आज जागीर की क़ीमत जो समझ आई तो
सारी जागीर लुटाने पे हँसी आती है
तेरी तस्वीर जो सीने से लगी रहती थी
आज सीने से लगाने पे हँसी आती है
जिस की सूरत के सिवा याद नहीं था कुछ भी
उस की अब याद दिलाने पे हँसी आती है
रोज़ खाते थे क़सम हम न जुदा होंगे कभी
आज उन क़समों के खाने पे हँसी आती है
जिस की बस एक छुअन से ही सिहर जाता था
उस को अब हाथ लगाने पे हँसी आती है
हर घड़ी याद किया करता था मैं दिल से जिसे
अब उसे दिल से भुलाने पे हँसी आती है
ख़्वाब तो ख़्वाब है पूरे नहीं होते हैं "असर"
ख़्वाब आँखों में बसाने पे हँसी आती है















