मजबूरियों के पाँव पे दस्तार गिर गई
मीनार जो बुलन्द थी इस बार गिर गई
दुश्मन ने दोनों हाथ उठाए तो आप ही
हाथों से मेरे छूट के तलवार गिर गई
साए में जिस के बैठ के रोते थे रात दिन
कल रात मेरे सर पे वो दीवार गिर गई
लोगों के बस सड़क पे उतरने की देर थी
ज़ालिम की एक दिन में ही सरकार गिर गई
अहसान ले के ग़ैर का आ तो गया इधर
लेकिन मेरी अना जो थी उस पार गिर गई
जाना तुम्हारा छोड़ के ऐसा लगा मुझे
जैसे नदी के बीच में पतवार गिर गई
लड़ने लगे हैं कुत्ते भी इंसान की तरह
रोटी हमारे हाथ से बेकार गिर गई
— Arvind Asar















