अपनी जानिब तो सभी को वो नज़र खींचती है

मैं मगर खिंच नहीं पाता वो जिधर खींचती है

तुझ को मालूम है लोगों से मुझे है वहशत
तुझ को मालूम है तू फिर भी उधर खींचती है

न तुझे मैं ही दिखूँ हूँ न मोहब्बत मेरी
कैसा नश्शा है जो तू शाम-ओ-सहर खींचती है

इक तरफ़ दूसरी वाली की हवस भी है मुझे
इक तरफ़ पहली मोहब्बत की डगर खींचती है

भूख ले जाती है दफ़्तर की तरफ़ खेंचे हुए
फिर ये क्या चीज़ मुझे सू-ए-हुनर खींचती है

— Ashutosh Vdyarthi

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