अज़-सर ए नौ, इब्तदा-ए-शौक़-ए-मन हो
गर मुझे तर्क-ए-क़रार-ए-दिल का फ़न हो
बेहिजाबन हुस्न-ए-मय आमद करे तो
किस क़दर बाहोश अहल-ए-अंजुमन हो
मुद्दतों के बाद लौटे हैं परिंदे
क्यों न ग़र्क़-ए-रक़्स इस दिल का चमन हो
रख ज़रा मासूम लोगों से भी दूरी
कौन जाने क्या पस-ए-अदब-ए-दहन हो
तुझसे बिछड़े तो हुआ महसूस "जस्सर"
क़ैद जैसे रूह के अंदर बदन हो
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