इश्क़ क़ातिल हुआ है जिस-तिस का
कोई अपना नहीं हुआ इस का
फिर रहा है वो दर-ब-दर तन्हा
इश्क़ कामिल नहीं हुआ जिस का
उम्र की तेज़ धूप में देखो
हुस्न ढलने लगा है नरगिस का
वक़्त का इंतिज़ार सब को है
वक़्त लेकिन है मुन्तजि़र किस का
गर जहाँ में ख़ुदा न होता तो
आशना कौन होता मुफ़लिस का
हर सफ़र में उसे मिली मंज़िल
रहनुमा है ख़ुदा यहाँ जिस का
मौत तो आ गई मुझे कब की
मैं अभी भी हूँ मुंतज़िर किस का
अश्क बरसे थे रात भर “जस्सर”
अब्र यादों का दिल में था खिसका
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