jis par gham-e-dauraan ka asar koii nahin hai | जिस पर ग़म-ए-दौराँ का असर कोई नहीं है

  - Dharmesh bashar

जिस पर ग़म-ए-दौराँ का असर कोई नहीं है
ऐसा तो ज़माने में बशर कोई नहीं है

क्या दौर है ज़ुल्मत की तरफ़दार है दुनिया
जिस सम्त उजाला है उधर कोई नहीं है

आईना दिखाते तो हैं मुझको मिरे अहबाब
पर पास मिरे ख़ुद की नज़र कोई नहीं है

इस शहर में ये रौशनी भी कितनी 'अजब है
मैं तो हूँ मिरा साया मगर कोई नहीं है

वो शख़्स जिसे ढूँढती रहती हैं निगाहें
उस शख़्स की मुद्दत से ख़बर कोई नहीं है

क्यूँँ देते हो दस्तक मिरे इस दिल पे सनम अब
दर खोलने वाला तो इधर कोई नहीं है

तुम धूप में हम-राह मेरे चल तो रहे हो
ये जान लो रस्ते में शजर कोई नहीं है

शाइर तो बनाया है ग़म-ए-हस्ती ने मुझको
वर्ना तो 'बशर' मुझ
में हुनर कोई नहीं है

  - Dharmesh bashar

Chehra Shayari

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