jis kisi par bhi teraa dar khul gaya hai | जिस किसी पर भी तेरा दर खुल गया है

  - Bhaskar Shukla

जिस किसी पर भी तेरा दर खुल गया है
ये समझ लीजे मुक़द्दर खुल गया है

क्यूँ तलाशें राह बाहर की कोई जब
रास्ता अंदर ही अंदर खुल गया है

एक नज़र में लुट गया है दिल सरापा
एक ही चाबी से घर भर खुल गया है

एक नदी सेहरा की होना चाहती है
एक नदी जिस पर समुंदर खुल गया है

जानते तो थे मगर दौरान-ए-मुश्किल
ये ज़माना और बेहतर खुल गया है

यार अब तो बंद कर बातें बनाना
राज़ तेरा शोबदागर खुल गया है

ग़लतियाँ गर्दन की अब गिनवाई जाएँ
किसके हाथों में था ख़ंजर खुल गया है

चंद रोज़ अब कुछ नया होना नहीं है
मीर का एक शे'र हम पर खुल गया है

दिल गली वीराँ रही कुछ दिन तेरे बिन
अब वहाँ यादों का दफ़्तर खुल गया है

भास्कर यूँँ ही नहीं खुलता कहीं भी
ध्यान से सुनिए उसे गर खुल गया है

  - Bhaskar Shukla

Dost Shayari

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