आवाज़ की दूरी पे खड़ा सोच रहा हूँ

अब कौन मुझे देगा सदा सोच रहा हूँ

छोटी सी नज़र आती है अतराफ़ की हर शय
इस वक़्त मैं कुछ इतना बड़ा सोच रहा हूँ

क्या सोचना था मुझ को तिरे बारे में लेकिन
अफ़्सोस तिरे बारे में क्या सोच रहा हूँ

तू ने तो मिरे बारे में सोचा भी नहीं है
मैं फिर भी कोई अच्छा बुरा सोच रहा हूँ

जिस दिन से उठीं मुझ पे तिरी सब्ज़ सी आँखें
मैं पेड़ नहीं फिर भी हरा सोच रहा हूँ

नुक़सान बहुत से थे गए साल के 'दानिश'
लेकिन तिरे बारे में बड़ा सोच रहा हूँ

— Danish Naqvi

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Waqt Shayari

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