दिल लगाने में फ़क़त दोस्तों रुस्वाई है
अपनी करतूतों की हमने भी सज़ा पाई है
नज़रें वो मोड़ती है देखते ही बस हमको
अपनी सूरत वो कभी हमको न दिखलाई है
उसके जाने से हुई है ये हमारी हालत
'इश्क़ की महफ़िलों में बस यही तन्हाई है
'इश्क़ के नाम से ही हमको बड़ी नफ़रत है
चोट इस 'इश्क़ में यूँँ हमने भी जो खाई है
अपने काग़ज़ पे लगे ख़ूब गिराने आँसू
सुन ऐ ''दानिश'' वो हमें याद बहुत आई है
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