सदाक़त-ए-इश्क़
इश्क़ की तुम हक़ीक़त समझ लो
इस को ग़म से गुज़रना पड़ेगा
उन की यादों में मसरूफ़ हो तुम
उन की यादों में रहना पड़ेगा
दर्द-ए-दिल अपना तुझ को सुनाऊँ
जी तो करता है तुझ को सुनाऊँ
तेरी आँखों से कह देंगी आँसू
अब मुझे भी निकलना पड़ेगा
अपने भी रूठ जाएँगे तेरे
रिश्ते भी छूट जाएँगे तेरे
लोग तुझ को कहेंगे निकम्मा
ऐसा लम्हा भी सहना पड़ेगा
तू भरोसा भी करता है जिस पे
बे-वजह होगा नाराज़ तुझ से
होता अक्सर यहाँ ऐसा आशिक़
इश्क़ से हाँ मुकरना पड़ेगा
वो तुझे भूल जाएँगे ऐसे
जाने ज़िंदा रहेगा तू कैसे
मशवरा बस यही देगा 'दानिश'
अलविदा तुझ को कहना पड़ेगा















