कू-ए-दिल से तू नज़रें चुरा कर गया

कोई आहट न की ऐसे आ कर गया

जा रहा था तो जाता बिना मशवरत
क्यूँ मुहब्बत से दिल को डराकर गया

ग़म न था मसअला होता ज़ाती अगर
तू चराग़-ए-महल्ला बुझाकर गया

तुझ से पहले यहाँ इक परिंदा रहा
तू गया संग उस को उड़ाकर गया

इश्क़ है जाविदाँ ये मुसलसल कहा
इश्क़ है जाविदाँ ये बता कर गया

थे सुख़न-वर सभी एक से एक वाँ
क्या न जाने 'तहम्मुल' सुनाकर गया

— Dhiraj Singh 'Tahammul'

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