कू-ए-दिल से तू नज़रें चुराकर गया
कोई आहट न की ऐसे आकर गया
जा रहा था तो जाता बिना मशवरत
क्यूँँ मुहब्बत से दिल को डराकर गया
ग़म न था मस'अला होता ज़ाती अगर
तू चराग़-ए-महल्ला बुझाकर गया
तुझ सेे पहले यहाँ इक परिंदा रहा
तू गया संग उसको उड़ाकर गया
'इश्क़ है जाविदाँ ये मुसलसल कहा
'इश्क़ है जाविदाँ ये बताकर गया
थे सुख़नवर सभी एक से एक वाँ
क्या न जाने 'तहम्मुल' सुनाकर गया
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