"हिज्र का मौसम"
तुम्हारे बिन अब ये मेरा जीना
सज़ा से कम तो नहीं है बिल्कुल
हर एक लम्हा लगे है मुझ को शदीद दुख से भरा हुआ है
यूँ मानो जैसे किसी परिंदे को उम्र भर की सज़ा मिली हो
बहार में भी ख़िजाँ के मौसम के जैसे लगने लगा है मुझ को
कि जैसे कोई यतीम बच्चे को गोद ले कर
किसी ने वापस किसी मदरसे पे रख दिया हो
कि जैसे सहरा में कोई दरिया बदल गया हो
तुम्हारे बिन अब हर एक मौसम है एक मौसम
कभी खिजांँ का बदल के मौसम बहार आए
कभी तो वापस से लौट कर के तू यार आए
— Dipendra Singh 'Raaz'















