तेरी गली में आए हैं फिर इस भरम पे आज
होगी तेरी निगाह-ए-करम यार हम पे आज
मातम मना रहा है जो तेरे सितम पे आज
ऐ इश्क़ मेरी लानतें उस मोहतरम पे आज
जिन को दिखाई देते थे मुझ में हज़ार ऐसे
वो चल रहे हैं मेरे ही नक़्श-ए-क़दम पे आज
इतने में तुम ने पीठ में ख़ंजर चुभो दिए
हम सोच ही रहे थे तुम्हारे करम पे आज
आ ही गई हमारी भी अब हुस्न पे निगाह
या'नी कि नास्तिक भी है दैर-ओ-हरम पे आज
हमको ये अम्न-ओ-चैन पे क्या ख़ाक लाएगी
जब आ गई तरक़्क़ी ही बारूद-ओ-बम पे आज
Read Full