अब कहो कारवाँ किधर को चले
रास्ते खो गए चराग़ जले
आँसुओं में नहा गईं ख़ुशियाँ
रूठ कर जब वो आ लगे हैं गले
'इश्क़ ग़म को उबूर कर न सका
रास्ते कारवाँ के साथ चले
हम पे गुज़री हैं हिज्र की रातें
हम जहन्नम में थे मगर न जले
थे मोहब्बत की इब्तिदा के क़ुसूर
वो तबस्सुम जो आँसुओं में ढले
ख़ाक से सैंकड़ों उगे ख़ुर्शीद
है अंधेरा मगर चराग़-तले
चाँद साकित है रुक गए तारे
अब वो आएँ तो ग़म की रात ढले
मय-कदे का तो ज़िक्र भी है गुनाह
अब हयात-ए-हरम पड़ी है गले
पुर्सिश-ए-हाल का जवाब था क्या
हँस पड़े हम कि जल्द बात टले
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Ehsan Danish
our suggestion based on Ehsan Danish
As you were reading Hijrat Shayari Shayari