जब अँधेरा ही फ़क़त आया नज़र हर सू मुझे

उस अँधेरी रात मेरा मिल गया जुगनू मुझे

आज मुश्किल से मिला है आप पर क़ाबू मुझे
अपने आँखों का ज़रा सिखलाइए जादू मुझे

घेर ले चारो तरफ़ से फूल की ख़ुशबू मुझे
बज़्म में गर हो मुयस्सर आप का पहलू मुझे

मैं हूँ नाबीना बताए कोई क्या आता है वो
आ रही है इस तरफ़ से आज उस की बू मुझे

है मेरी ख़्वाहिश यतीमों का बनूँ मैं आसरा
और दे दे ज़िन्दगी तू और दे बाज़ू मुझे

दे दिया मुझ को ग़म-ए-हिजरां के हाथो में तमाम
ये बता किस मुँह से अपना अब कहेगा तू मुझे

बा'द मुद्दत देख कर के देखता ही रह गया
भूल ही बैठा हो जैसे कर को वो मदऊ़ मुझे

वक्त-ए-रुख़्सत आबदीदा हो ना जाऊँ ढाँप ले
तेरी जानिब खींचते हैं क्यौं तेरे गेसू मुझे

क्या तेरी नज़रों में इस से नीम तर अच्छा हूँ मैं
जितना अच्छा लग रहा है ऐ परी रू तू मुझे

मैं तेरे कमरे में लटकी सीनरी में क़ैद हूँ
रोज़ तुझ से बोलता हूँ पास आ कर छू मुझे

नाख़ुदा-ए-जी़स्त उस ने मुझ को अपना मान कर
मोःतमिद हो कर दिया है नाव का चप्पू मुझे

सोच कर खु़श होता हूँ मैं देख कर के ग़म-ज़दा
कितने मानीख़ेज़ लगते हैं तेरे आँसू मुझे

चश्म-ए-जाना से मिला फ़ौज़ान फ़न्ने शा'इरी
पैकर-ए-जाना के हसरत में मिली उर्दू मुझे

— Fauzan Aoon Azmi

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Nazar Shayari

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