ख़्वाब सच करने को मैं जीता नहीं था

क्योंकि जो उम्मीद का क़तरा नहीं था

हाथ जोड़ू ख़ुद को मैं लगता नहीं था
या'नी मैं जो ज़ब्त को पीता नहीं था

आँखों की चौखट पड़ी है धूल मतलब
वक़्त ने तोड़ा था पर बिखरा नहीं था

इक महल देखा था बुत का और देखा
एक बुत जिस पे कोई साया नहीं था

हारी सफ़ में मैं खड़ा था सब से आगे
सच कहूँ तो दिल से मैं पसपा नहीं था

है छुआ मुझ को लबों ने जाने कब कब
बस जबीं पर ही मिला बोसा नहीं था

दे दिया है जो ठिकाना तू ने सब को
तुझ को ही तो बस मैं इक दिखता नहीं था

— gaurav saklani

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