ham ko dikha dikha ke ghairoon ke itr malna | हम को दिखा दिखा के ग़ैरों के इत्र मलना

  - Hafeez Jaunpuri

हम को दिखा दिखा के ग़ैरों के इत्र मलना
आता है ख़ूब तुम को छाती पे मूँग दलना

महशर बपा किया है रफ़्तार ने तुम्हारी
इस चाल के तसद्दुक़ ये भी है कोई चलना

ग़ैरों के घर तो शब को जाते हो बारहा तुम
भूले से मेरे घर भी इक रोज़ आ निकलना

हट की कुछ इंतिहा है ज़िद की भी कोई हद है
ये बात बात पर तो अच्छा नहीं मचलना

जलता है ग़ैर हम से तो क्या ख़ता हमारी
तुम ये समझ लो उस की तक़दीर में है जलना

जब तक हैं तेरे दर पर दिल-बस्तगी सी है कुछ
ये आस्ताँ जो छूटा मुश्किल है जी बहलना

देखो 'हफ़ीज़' अपने जी की जो ख़ैर चाहो
बस्ते जिधर हसीं हों वो रास्ता न चलना

  - Hafeez Jaunpuri

Dushmani Shayari

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