न कोई आख़िरी ख़्वाहिश न कोई इल्तिजा है अब
तुम्हारे वास्ते दिल में मिरे इक बद-दुआ है अब
हम ऐसे लोग हैं जिन को मुहब्बत रास ना आई
हमारे दिल की बस्ती भी न जाने क्या से क्या है अब
कभी वो प्यार करती थी कभी इज़हार करती थी
वही लड़की न जाने कब से यारों बे-वफ़ा है अब
मुहब्बत थी तभी तो थी तेरी शोहरत ज़माने में
अगर वो बे-वफ़ा निकली तो तुझ
में क्या बचा है अब
कभी लोगों में उल्फ़त थी मुहब्बत थी सदाक़त थी
मगर सरवर न जाने क्यूँ मुहब्बत भी सज़ा है अब
— Hameed Sarwar Bahraichi















