चेहरे पे हर किसी के यहाँ इक नक़ाब है
मेरा ये सच बताना ही तो इक अज़ाब है
जेबें हैं साफ़ हाथ में कुछ भी नहीं रहा
ले दे के जो भी पास है तो बस शराब है
रुतबा सुकून ख़्वाब भी अब खो चुका हूँ मैं
लहज़ा ही बस बचा है जो थोड़ा ख़राब है
कल तक जो चूमता था मेरे हाथ रात-दिन
अब वो ही मेरे नाम से करता हिजाब है
औक़ात की जो बात यहाँ कर रहे हैं लोग
उन का भी मेरे पास मुकम्मल हिसाब है
पूछा अगर किसी ने मिरी मात का सबब
मेरी हँसी ही आज तो उन का जवाब है
तुम क्या गिराओगे मुझे दुनिया की आँख से
'रेहान' कल नवाब था अब भी नवाब है
— REHAN KHAN















