मोहब्बतों की फ़क़त बात के सिवा कुछ भी

नहीं नसीब में जज़्बात के सिवा कुछ भी

जो पा के शोहरतें झूठी हुआ अना का मरीज़
उसे मिला न फिर औक़ात के सिवा कुछ भी

तमाम रात मैं तन्हा जला किया लेकिन
मिला न अश्क की बरसात के सिवा कुछ भी

उसे भुलाया मुकम्मल तरह से है लेकिन
है नाम याद न इस बात के सिवा कुछ भी

न जाने क्यों मुझे वो अपना मान बैठा था
मिला उसे न मेरे साथ के सिवा कुछ भी

सभी ने तर्क-ए-वफ़ा को कहा मुनासिब है
किसी को याद न हालात के सिवा कुछ भी

हर एक शख़्स है दुनिया में दूसरे का हरीफ़
दिखा न मुझ को ख़राबात के सिवा कुछ भी

— REHAN KHAN

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