बस इक तुम्हारे लौटने के ए'तिबार में
हमने जवानी ज़ाया' की है इंतिज़ार में
टूटा हूँ बे-हिसाब मगर इतना जान लो
दाख़िल न होगा दूजा कोई इस दरार में
मैं वो जिसे छला है ज़माने ने हर क़दम
कैसे यक़ीन कर लूँ तिरा एक बार में
क्या कीजिए जो हार गया दिल मैं ख़ार पर
यूँँ तो बहुत से फूल खिले थे बहार में
पहलू में उसके बैठ के ये 'इल्म हो गया
पत्थर को कैसे मोम बनाते हैं प्यार में
उनकी यूँँ बढ़ती बे-रुख़ी से ये सुकून है
कुछ तो इज़ाफ़ा हो रहा मेरी पगार में
महफ़िल में ‘हर्ष’ उनकी तवज्जोह को छोड़कर
कुछ भी मुनाफ़ा है नहीं इस रोज़गार में
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