"तारीफ़-ए-यार"

कुछ नहीं ये हीरे-मोती तुम्हारी
आँखों की चमक के सामने
जिन्हे एक दफ़ा देखते ही मेरा
दिल मदहोश हो जाता है
गर देख ले चाँद रुख़्सार तुम्हारा
तो दीवाना हो जाए इनका
और जब बोलती हो तुम
अपने नाज़ुक लबों से
तो चहचाते हुए पंछी भी
शांत हो जाते हैं
ये बिखरे लम्बे बाल तेरे
सभी हसीन वादियों से ख़ूब-सूरत हैं
मैं क्या ही ता'रीफ़ करूँ
तुम्हारी हर इक शय की
बैठता हूँ कुछ लिखने तो
मेरे लफ़्ज़ ही मुझ से शरमा जाते हैं
तुम बहुत सताते हो मुझे
यादों में ख़्वाबों में ख़यालों में
इक बार सीने से भी लगा लो
तुम्हारा क्या जाता है

— Shubham Burmen

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