आ जाए वो मिलने तो मुझे ईद-मुबारक

मत आए ब-हर-हाल उसे ईद-मुबारक

ऐसा हो सब इंसान हों ख़ुश इतने कि हर रोज़
इक दूसरे से कहता फिरे ईद-ए-मुबारक

हाँ मुझ से जिसे जिस से मुझे जो भी गिला हो
आबाद रहे शाद रहे ईद-ए-मुबारक

तन्हाई सी तन्हाई कि दीवार भी शश्दर
अब खुल के कहे या न कहे ईद-ए-मुबारक

सरगोशी ने पत्थर को सबक़ याद दिलाया
पानी ने लिखा आईने पे ईद-ए-मुबारक

तुम जो मिरे शे'रों के मुख़ातिब थे न होगे
आख़िर में तुम्हें सिर्फ़ तुम्हें ईद-मुबारक

— Idris Babar

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