
देखा है अभी तुम ने तुम ने अभी जाना है
लेकिन ये ज़माने का अंदाज़ पुराना है
क्या कार-ए-अज़ीयत है करना उसे रुख़्सत भी
आँसू भी छुपाने हैं हँसकर भी दिखाना है
इस बज़्म-ए-मोहब्बत में कुछ देर ज़रा ठहरो
किस बात की जल्दी है आख़िर कहाँ जाना है
कुछ और कहा होता तो मान भी जाता दिल
पर तुम ने बनाया जो कॉमन सा बहाना है
— Irshad 'Arsh'















