वो क्यूँँ चाहे अच्छा मेरा
जिस से हुआ है झगड़ा मेरा
अब ग़ैरों के हाथों में है
जिस दिल पर था क़ब्ज़ा मेरा
उस की माँग सजाने का अब
टूट गया है सपना मेरा
जिस ने उस की माँग भरी है
दोस्त हुआ करता था मेरा
यार ज़रा भी शर्म न आई
खाकर तुझ को हिस्सा मेरा
जीत न पाता जिस लड़की से
पड़ जाता है पाला मेरा
— Jitendra "jeet"















