ख़ुद पे लिखनी है इक किताब मुझे
मार डाले न ये अज़ाब मुझे
अव्वल अव्वल तो ख़्वाब अच्छे मगर
अब डराते हैं मेरे ख़्वाब मुझे
आजकल वाइज़ों में रहता हूॅं
रिंदों को दो न दो शराब मुझे
बस मैं दिखता हूॅं शाइरों जैसा
यूँँॅं तवज्जोह न दो जनाब मुझे
बे-हिजाबों का क्या बयान करूँॅं
अच्छा लगता है बस हिजाब मुझे
ध्यान से देख लूॅं तो दिन में भी
साफ़ दिखता है माहताब मुझे
क्या हसीनों को ही मुयस्सर है
कोई देता नहीं गुलाब मुझे
इक महीने को नाम रखकर जू'न
एक लाना है इंकिलाब मुझे
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