तेरे दिल और धड़कनों के दरमियाँ से मैं

जाऊँगा फिर कहाँ पे जो निकला यहाँ से मैं

थी दिल-लगी या दिल की लगी कुछ पता नहीं
यूँ ही गुज़र रहा था हर इक इम्तिहाँ से मैं

होगा रक़ीब भी न था वहम-ओ-गुमान में
मशग़ूल गुफ़्त-ओ-गू में रहा जान-ए-जाँ से मैं

अव्वल से इल्म में थी तिरे दास्ताँ मेरी
ला-इल्म आज-तक हूँ तिरी दास्ताँ से मैं

फिर इक जगह पे उस से मिरा राब्ता हुआ
फिर लौट कर न गुज़रा कभी याँ वहाँ से मैं

वो छोड़ कर गई है जो कहती थी ये कि 'जून'
जाओगे मुझ से दूर तो जाऊँगी जाँ से मैं

— 'June' Sahab Barelvi

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