दयार ए ख़्वाब था तुम थे तमाम दुनिया थी
किसी ने आ के जगाया तो मैं अकेला था
कोई हुसैनी न निकला मेरे रफ़ीको में
दिया बुझा के जलाया तो मैं अकेला था
तुम्हारा हाथ नहीं था वो मौज ए गिर्या थी
मेरी समझ में जब आया तो मैं अकेला था
दयार ए गैर गया था मैं ख़ुशियाँ लाने को
पलट के गाँव जब आया तो मैं अकेला था
कहाँ से आई है आख़िर तेरी तलब मुझ में
मुझे ख़ुदा ने बनाया तो मैं अकेला था
— Khalid Nadeem Shani















