
लगा के ज़ख़्म पर जानाँ नमक हँसकर ग़ज़ल कहना
बहुत होता है मुश्किल फिर सनम तुझ पर ग़ज़ल कहना
सजी होती है इक महफ़िल पुराने यार होते हैं
वही पीना पिलाना और ज़ियादा-तर ग़ज़ल कहना
— Rovej sheikh
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