बस्ती बस्ती ख़ाक उड़ाये, बस वहशत का मारा हो

उस से इश्क़ की आस न करना जिस का मन बंजारा हो

सारे तारों की निय्यत में एक ही पहलू ठहरा है
चाहे क़ीमत कोई भी हो, लेकिन चाँद हमारा हो

क़तरा क़तरा रोना भी क्या हिज्र के मौसम का रोना?
चश्म-ए-तर मम्बा हो जाए मू-ए-मिज़ा फव्वारा हो

बचपन की भी ख़्वाहिश देखो तकते रहते थे अंबर?
ख़्वाबों की हसरत थी सैर को परियों का सय्यारा हो

इतना कह कर छोड़ आया मैं उस के कूचे को परसों
जा मेरा दिल तोड़ने वाले, तुझ को इश्क़ दुबारा हो

यार सियासी तलवारों को पीना है हर रोज़ लहू
चाहे लाश प लाश बिछें या ख़ूँ से तर गहवारा हो

ख़ुद को शाइ'र कहते रहना दिल को लाख सुकूँ दे दे
लेकिन दुनिया की नज़रों में तुम अब भी आवारा हो

— Daagh Aligarhi

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