kitna dushwaar hai jazbon ki tijaarat karna | कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना

  - Liaqat Jafri

कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना
एक ही शख़्स से दो बार मोहब्बत करना

जिस को तुम चाहो कोई और न चाहे उस को
इस को कहते हैं मोहब्बत में सियासत करना

सुरमई आँख हसीं जिस्म गुलाबी चेहरा
इस को कहते हैं किताबत पे किताबत करना

दिल की तख़्ती पे भी आयात लिखी रहती हैं
वक़्त मिल जाए तो उन की भी तिलावत करना

देख लेना बड़ी तस्कीन मिलेगी तुम को
ख़ुद से इक रोज़ कभी अपनी शिकायत करना

जिस में कुछ क़ब्रें हों कुछ चेहरे हों कुछ यादें हों
कितना दुश्वार है उस शहरस हिजरत करना

  - Liaqat Jafri

Waqt Shayari

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