क्यूँँ कहें ये ज़िंदगी बर्बाद है
अब तो रोने पर भी मिलती दाद है
मेरे कर्मों पर नज़र भी रख जरा
ऐ ख़ुदा तुझ सेे यही फ़रियाद है
पैसों की ख़ातिर बिकूँगा मैं नहीं
इस से ऊपर इज़्ज़त-ए-अज्दाद है
अपने पापों को तू धो कर जा यहाँ
उस नरक के दर पे इक जल्लाद है
बहर में ला दें ख़यालों को अगर
मान लेंगे हम तू भी उस्ताद है
शे'र में तो वज़्न तुझको रखना है
मैं यही कह सकता हूँ इरशाद है
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