जैसे रस्तों पर जोगी दिन रात भटकते फिरते हैं

ऐसे दीवारों पर सर कुछ यार पटकते फिरते हैं

इस झूठी चाहत के लिए पूरी दुनिया भर में देखो
पंखे से अब कितने सारे लोग लटकते फिरते हैं

तुम ख़ुद्दारी का जीवन मत जीना मारे जाओगे
हम तो ख़ुद ही सब के दिल में यार खटकते फिरते हैं

क्या दौलत की गर्मी अब बर्दाश्त नहीं होती इनसे
बे-मतलब में ही सड़कों पर लोग अटकते फिरते हैं

— Manish watan

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