गुज़रा हुआ कल भी ठहरता है कभी
जो बीतता पल भी ठहरता है कभी
फ़ितरत किसे ही अब्र की होती पता
बे-वज्ह बादल भी ठहरता है कभी
जल आसमाँ से जब बरसता है तभी
इक बूँद ही जल भी ठहरता है कभी
जब वक़्त पर बारिश मुसलसल हो अगर
फिर खेत में हल भी ठहरता है कभी
आँसू अगर बहते रहे आँखों से तब
नम-नाक जल-थल भी ठहरता है कभी
साहिल 'मनोहर' दूर जब होता बहुत
फिर सर पे बादल भी ठहरता है कभी
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