qismat agar roothe tabhi fursat kahaan | क़िस्मत अगर रूठे तभी फ़ुर्सत कहाँ

  - Manohar Shimpi

क़िस्मत अगर रूठे तभी फ़ुर्सत कहाँ
नज़रे झुकाए रोज़ तो जुरअत कहाँ

हर शख़्स की होती नहीं क़ीमत यहाँ
है इल्म तो दिखती उसे सूरत कहाँ

सारे जहाँ भी देखते बुत में जिसे
बनती तराशे ही बिना मूरत कहाँ

हाँ दूर तक मिलती तबीअत है कहाँ
दिल से सफ़ा इस शहर में नफ़रत कहाँ

दिल में मुहब्बत है मेरे चाहत भी है
नादान वस्ल-ए-यार की हसरत कहाँ

सच है जहाँ में माँ अगर हो साथ तो
औलाद को उस से बड़ी दौलत कहाँ

इंसानियत से क्यूँँ उन्हें नाराज़गी
इक दूसरे को जानना फ़ितरत कहाँ

तौहीन क्यूँँ इंसान की होती कभी
फ़ितरत 'मनोहर' है जुदा सीरत कहाँ

  - Manohar Shimpi

Rahbar Shayari

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