इक बार रू-ब-रू जो हुए आगही से हम
फिर आँख ही मिला नहीं पाए ख़ुदी से हम
जलते न क्यूँ बताओ जहन्नुम की आग में
गुज़रे तमाम उम्र बदी की गली से हम
जैसी मिली थी वैसी ही जी कर गुज़ार दी
जाते भी भाग कर कहाँ इस ज़िंदगी से हम
मुश्किल था एक पल भी सुकूँ से गुज़ारना
वाक़िफ़ ज़रा भी हो न सके बे-ख़ुदी से हम
ख़ुशियाँ तो बाँट ली थीं सभी अपने ग़ैर से
बस कह सके न ग़म का फ़साना किसी से हम
जाना कहाँ था और चले आए हैं कहाँ
यूँ ही भटकते फिर रहे कितनी सदी से हम
बनती चली गई थी तमाशा ये ज़िंदगी
बस देखते ही रह गए थे बेबसी से हम
जब हाथ तंग हो गए तो पूछिए न फिर
सब की नज़र में हो गए थे अजनबी से हम
ज़ाहिर कभी न होने दिया दर्द-ए-दिल 'उमर'
मिलते रहे हर एक से ज़िंदा-दिली से हम














