छोड़ कर मुझ को कहीं और अगर जाना है

जा इजाज़त है तुझे तुझ को जिधर जाना है

तू तो ख़ुशबू है किसी सम्त चला जाएगा
मैं हूँ इक रेत का पैकर सो बिखर जाना है

एक मुद्दत है हुई राह में चलते लेकिन
इस का जाना ही नहीं है कि किधर जाना है

अब तिरी याद भी कब मुझ पे असर करती है
तू भी इक रोज़ मिरे दिल से उतर जाना है

हम तो आशिक़ हैं मियाँ हम हैं शबों के आदी
आप जा सकते हैं गर आप को घर जाना है

लाख पड़ जाएँ हमें जान के लाले लेकिन
जान तुझ को ही मिरी जान मगर जाना है

करते रहना है तिरे पीछे वफ़ा के दा'वे
सामने तेरे मगर मुँह पे मुकर जाना है

कीजे फिर'औन से शद्दाद से इबरत हासिल
ज़ेर ये हो गए सारे जो ज़बर जाना है

बस यही सोचते हम तुम तो न नफ़रत करते
न सही आज मगर कल हमें मर जाना है

होने दूँगा न कमी चेहरे से ज़ाहिर तेरी
हिज्र में यार तिरे और निखर जाना है

अब के बिछड़े हैं तो ये जी में है आया 'क़ैसर'
अब नहीं जीना यहाँ जाँ से गुज़र जाना है

— Meem Maroof Ashraf

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Judai Shayari

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