होता है मुनाफ़ा बड़े बाज़ार बहुत हैं
नफ़रत के भी दुनिया में ख़रीदार बहुत हैं
मिलता नहीं ग़ालिब सा यहाँ कोई सुख़नवर
शुअरा भी बहुत हैं यहाँ फ़नकार बहुत हैं
अब बीच में रिश्तों के जो दीवार खड़ी की
तकरार अना की है ख़ता-कार बहुत हैं
जो खोखली करते हैं ज़मीं पाक वतन की
घर में ही छिपे साहिब-ए-ग़द्दार बहुत हैं
झूठी हूँ दग़ाबाज़ हूँ अफ़वाह न फैला
लिखने को ख़बर झूठी ये अख़बार बहुत हैं
किस किस को सज़ा देगा ये क़ानून हमारा
जिस मोड़ से गुज़रोगे गुनहगार बहुत हैं
'मीना' की ग़ज़ल जीत रही क़ल्ब सभी का
अशआर तुम्हारे ये असरदार बहुत हैं
— Meena Bhatt















