आह जिस वक़्त सर उठाती है
अर्श पर बर्छियाँ चलाती है
नाज़-बरदार-ए-लब है जाँ जब से
तेरे ख़त की ख़बर को पाती है
ऐ शब-ए-हिज्र रास्त कह तुझ को
बात कुछ सुब्ह की भी आती है
चश्म-ए-बद्दूर-चश्म-ए-तर ऐ 'मीर'
आँखें तूफ़ान को दिखाती है
— Meer Taqi Meer
अर्श पर बर्छियाँ चलाती है
नाज़-बरदार-ए-लब है जाँ जब से
तेरे ख़त की ख़बर को पाती है
ऐ शब-ए-हिज्र रास्त कह तुझ को
बात कुछ सुब्ह की भी आती है
चश्म-ए-बद्दूर-चश्म-ए-तर ऐ 'मीर'
आँखें तूफ़ान को दिखाती है
Other ghazal from the same pen
Shers of afsos.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling